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होली : रंगों के उत्सव में राजनीति की परछाईं

होली, भारत का वह पावन पर्व जो हर साल फाल्गुन की बयार के साथ आता है और जन-जन के मन को रंगों की फुहार से भिगो देता है। यह महज एक त्योहार नहीं, बल्कि सदियों पुरानी सांस्कृतिक विरासत का जीवंत प्रमाण है। प्रह्लाद की भक्ति, होलिका के दहन और राधा-कृष्ण की रासलीला से जन्मा यह उत्सव आज भी उतनी ही ऊर्जा और उमंग के साथ मनाया जाता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इस रंगों के पर्व की आड़ में राजनीति के कितने रंग छुपे हैं? प्राचीन जड़ें, शाश्वत संदेश होली की कहानी उतनी ही पुरानी है जितनी भारतीय सभ्यता। हिरण्यकश्यप नामक अहंकारी राजा, उसका ईश्वरभक्त पुत्र प्रह्लाद और होलिका की अग्नि — यह त्रिकोण आज भी हमें सिखाता है कि अहंकार और अधर्म का अंत निश्चित है। होलिका दहन इसी सत्य का प्रतीक है — बुराई जलती है, अच्छाई बचती है। वहीं दूसरी ओर, वृंदावन की होली में प्रेम का रंग घुला है। कृष्ण और राधा की रासलीला ने होली को केवल धार्मिक नहीं बल्कि भावनात्मक उत्सव भी बना दिया। यही कारण है कि होली हर वर्ग, हर उम्र और हर मन को छूती है। औपनिवेशिक काल में होली — नियंत्रण और जिज्ञासा के बीच जब अंग्रेज भारत आए तो होली उन...