होली : रंगों के उत्सव में राजनीति की परछाईं

होली, भारत का वह पावन पर्व जो हर साल फाल्गुन की बयार के साथ आता है और जन-जन के मन को रंगों की फुहार से भिगो देता है। यह महज एक त्योहार नहीं, बल्कि सदियों पुरानी सांस्कृतिक विरासत का जीवंत प्रमाण है। प्रह्लाद की भक्ति, होलिका के दहन और राधा-कृष्ण की रासलीला से जन्मा यह उत्सव आज भी उतनी ही ऊर्जा और उमंग के साथ मनाया जाता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इस रंगों के पर्व की आड़ में राजनीति के कितने रंग छुपे हैं?


प्राचीन जड़ें, शाश्वत संदेश


होली की कहानी उतनी ही पुरानी है जितनी भारतीय सभ्यता। हिरण्यकश्यप नामक अहंकारी राजा, उसका ईश्वरभक्त पुत्र प्रह्लाद और होलिका की अग्नि — यह त्रिकोण आज भी हमें सिखाता है कि अहंकार और अधर्म का अंत निश्चित है। होलिका दहन इसी सत्य का प्रतीक है — बुराई जलती है, अच्छाई बचती है।


वहीं दूसरी ओर, वृंदावन की होली में प्रेम का रंग घुला है। कृष्ण और राधा की रासलीला ने होली को केवल धार्मिक नहीं बल्कि भावनात्मक उत्सव भी बना दिया। यही कारण है कि होली हर वर्ग, हर उम्र और हर मन को छूती है।

औपनिवेशिक काल में होली — नियंत्रण और जिज्ञासा के बीच

जब अंग्रेज भारत आए तो होली उनके लिए एक अजीब और अबूझ पहेली थी। 17वीं सदी में डॉ. जॉन फ्रायर जैसे यूरोपीय यात्रियों ने होली का वर्णन एक अराजक किंतु जीवंत उत्सव के रूप में किया। एक तरफ कुछ ब्रिटिश अधिकारी इस रंगीन उत्सव में शामिल होते थे, वहीं दूसरी तरफ औपनिवेशिक सत्ता इसकी भीड़ और उन्माद से डरती भी थी।

अंग्रेजों ने कई बार होली के जुलूसों पर पाबंदियां लगाने की कोशिश की क्योंकि उन्हें डर था कि यह उत्सव विद्रोह की आग भड़का सकता है। और उनका यह डर बेबुनियाद नहीं था। 1857 के स्वतंत्रता संग्राम से पहले भी होली के अवसर पर जनता में एकजुटता की भावना प्रबल होती थी।


स्वतंत्रता संग्राम में होली का रंग


भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों ने होली को एक राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल किया। जब अंग्रेज रंगों से डरते थे, तब क्रांतिकारी उन्हीं रंगों में विद्रोह की स्याही घोलते थे। होली के जमावड़े बैठकों का काम करते थे, गीतों में क्रांति के संदेश छुपे होते थे।

महात्मा गांधी ने होली को सामाजिक एकता के प्रतीक के रूप में देखा। उनके लिए यह पर्व जाति, धर्म और वर्ग की दीवारें तोड़ने का अवसर था। उन्होंने कहा था कि जब एक गरीब और एक अमीर एक ही रंग में रंग जाते हैं, तो भेद की दीवारें खुद-ब-खुद गिर जाती हैं।


स्वतंत्र भारत में होली — एकता का राजनीतिक मंच


आजादी के बाद भारत के प्रधानमंत्रियों ने होली को राष्ट्रीय एकता के मंच के रूप में अपनाया। जवाहरलाल नेहरू से लेकर आज तक, होली मिलन समारोह दिल्ली की राजनीति का अनिवार्य हिस्सा बन गए।

लेकिन धीरे-धीरे यह सांस्कृतिक उत्सव राजनीतिक गलियारों में एक अवसर बन गया — गठबंधन बनाने का, विरोधियों को गले लगाने का, और कैमरों के सामने रंग लगाकर जनता को संदेश देने का। होली मिलन अब केवल खुशी का नहीं, रणनीति का भी मंच बन चुका है।


आज की होली — संस्कृति और राजनीति का संगम


आज की होली कई परतों में जीती है। एक तरफ गांवों में अभी भी परंपरागत होली मनाई जाती है — ढोल की थाप पर, फूलों के रंगों से, सामूहिक भोज के साथ। वहीं शहरों में होली पार्टियां, डीजे और महंगे केमिकल रंगों ने इसका स्वरूप बदल दिया है।


राजनीतिक दलों के लिए होली वोट बैंक को साधने का मौसम भी है। हर पार्टी होली से पहले कार्यक्रम आयोजित करती है, नेता मंदिरों में माथा टेकते हैं, होलिका दहन में शामिल होते हैं — क्योंकि जनता की भावनाओं से जुड़ना ही असली राजनीति है।


होली का असली संदेश


इन सब परतों के बावजूद होली का मूल संदेश आज भी प्रासंगिक है। बुराई का दहन, प्रेम का प्रसार और समानता का उत्सव — ये तीन स्तंभ होली को अमर बनाते हैं।

जब हम रंग लगाते हैं तो एक पल के लिए सब बराबर हो जाते हैं — न नेता, न जनता, न अमीर, न गरीब। बस इंसान और इंसान। शायद यही होली की सबसे बड़ी राजनीति है — वह राजनीति जो बांटती नहीं, जोड़ती है।


होली है! 🎨



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